Wednesday, September 30, 2020

मैं पथिक

   

                                                                                                    by- Vikas Ojha


  "मैं पथिक     

मैं पथिक पथ पर तठस्त होकर प्रशस्त  हो रहा हूँ। 

मै पथिक पथ पर ...............  हो रहा हूँ। 

है कौरवो तूफ़ा के उफान मेरे ह्रदय में। 

पहले मै शख्त था अब मै शसक्त होकर 

प्रशस्त हो रहा हूँ।  

मैं पथिक पथ पर तठस्त होकर प्रशस्त  हो रहा हूँ। 

पहले तो मेँ पत्थर था अब मै चट्टान बन रहा हूँ। 

मैं पथिक पथ पर तठस्त होकर प्रशस्त  हो रहा हूँ। 

ओस की बूंदो सी मुस्कान लिए मुस्कुराता चला जा रहा हूँ। 

हर पल को मुस्कुराते हुए जीए जा रहा हु।  

मैं पथिक पथ पर तठस्त होकर प्रशस्त  हो रहा हूँ। 

हर विकट परिस्थिति में भी में समाधान ढूढे चला जा रहा हूँ। 

चिंता में भी मुस्कुराते हुए चिंतन किये जा रहा हूँ। 

मैं पथिक पथ पर तठस्त होकर प्रशस्त  हो रहा हूँ। 

मद- मस्त गजानंद सी चाल चले जा रहा हूं||

थी मन में एक छोटी सी आशा किंतु जग मे 

जब देखा अनेकों निराशा तो मैं जरा सा घबराया 

किंतु मुझे पथ ही समझ में आया।

निराशा में ही आशा है फिर क्यों नीर बहाना।

आशा की किरण  नीर पे ही जलाना।।

बगैर बहुत कुछ सोचे -समझे सौंधी-मिट्टी सी

मुस्कान लिये चला जा रहा हूँ |

मैं पथिक पथ पर तठस्थ होकर प्रशस्त हो रहा हूं    

पथ पर चलते- चलते दिनकर का प्रतिबिंब जल मे ।   

मिलकर  ऐैसा  प्रतिदीप्ति दिखता है जैसे मानो आंगन    

में लालन की  किलकिला हट।।

मैं पथिक पथ पर तटस्थ होकर प्रशस्त हो रहा हूं।

मुस्कुराती  सुबह चिलचिलाती दोपहर को प्यार से गले  लगा रहा हूं ।।

मैं पथिक पथ पर तटस्थ होकर प्रशस्त हो रहा हूं।

सुदृढ़ विचारधारा  लिए चला जा रहा हूं

मैं पथिक पथ पर  तटस्थ होकर प्रशस्त हो रहा हूं

है कौरवों तूफान के  उफॉ  मेरे ह्रदय में

पहले मैं सख्त था अब सशक्त होकर प्रशस्त हो रहा हूं मैं।    

पथिक पथ पर तटस्थ  होकर प्रशस्त हो रहा हू                          

 विकास ओझा